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श्रीमद भागवत : ब्राह्मणो के घर खाना बनाने वाली दलित महिला के बेटे थे नारद ऋषि

"छुआछूत शास्त्रों में वर्णित नहीं है जो मनु स्मृति में लिखा है वो ही शास्त्रों में ही लिखा है, गलत मतलब समझने या समझें के चलते ये सब हुआ है और हो रहा है. जाने एक"
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image sources: Theharekrishnamovement

सुन कर भले ही चौंक गए हो लेकिन क्षुद्र की परछाई भी पड़ने पर नहाना, एक कुए से पानी नहीं भरने देना दीखते ही नहाना फ्ला फ्ला तरह से दलितों पर अत्याचार भले ही हुए है लेकिन वो धर्म का हिस्सा नहीं था. हाँ, ये सब धर्म के नाम पर हुआ था लेकिन धर्म इन सब की इजाजत नहीं देता है.

"मनुस्मृति" में भी ऐसा कुछ नहीं लिखा है, मनुवादी सोच जैसा भी कुछ नहीं है असल में सच को पहचानने की कोशिश ही नहीं हुई है कभी. अगर ऐसा लिखा होता तो एक क्षुद्र विधवा के बेटे नारद ऋषि ब्राह्मण के घर में नहीं रहते और वो कभी नारद ऋषि भी नहीं बन पाते.

अम्बेडकर के साथ क्या क्या अत्याचार हुए अब ये भी जाने, उन्हें स्वर्णो के बराबर में बैठने नहीं दिया जाता था एक मटकी से पानी नहीं पिने दिया जाता था. उनके समय में दलितों को गांव के कुए से पानी नहीं भरने दिया जाता था वो स्वर्णो के सामने से नहीं निकल सकते थे.

अब इन अत्याचारों के विषय में ये सोचिये की नारद जी एक दलित पुत्र थे और उनकी माँ ब्राह्मणो के घर में काम करती थी...


image sources: Shrimadbhagwat

जो भी अत्याचार दलितों पर हुए थे या हो रहे है वो सभी इसी युग की देंन है और पाखंडियो ने शुरू की है ये धर्म का हिस्सा नहीं है! ऊपर तस्वीर है जिसमे नारद जी ब्राह्मणो से बातचीत कर रहे है और उनकी माँ पीछे पानी घर रही है घर के कुए से और ब्राह्मणो को क्षुद्रो से कोई  द्वेष नहीं है.

अब जाने पूरी कहानी, ऊबहर्न नाम का एक क्षुद्र बालक एक विधवा स्त्री का पुत्र था जो की किसी ब्राह्मण के घर में नौकरानी का काम करती थी, उन ब्राह्मणो के घर एक बार ऋषियों की मण्डली ठहरी जिनकी बालक ने खूब सेवा की. सेवा के बदले ऋषियों ने उसे भी कई प्रवचन दिए, जिससे उनके मन में भी परमात्मा के प्रति श्रद्धा जाग गई.


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ऋषि चले गए लेकिन उसके अंदर प्रकाश हो गया, वो भी उनके साथ जाना चाहता था लेकिन माँ को छोड़ कैसे जाए. एक दिन माँ को एक सर्प ने छू लिया और वो परलोक सिद्धार गई, अब बालक स्वतंत्र था वो ऋषियों द्वारा सिखाये गए मन्त्र जपता हुआ तीर्थो की यात्रा करने लगा लेकिन उसे भगवान् नहीं मिले.

अनंत वो एक वन में बैठ तपस्या करने लगा जंहा मन में उसे भगवान् के दर्शन हुए जिन्होंने उससे कहा की इस जन्म में तुम्हे दर्शन नहीं होंगे लेकिन अगले जन्म में तुमपे में कृपा करूँगा. बालक प्रसन्न हुआ लेकिन फिर दुखी भी हुआ इसी दूध में उसके प्राण पखेरू उड गए और वो ब्रह्मलोक चला गया.  

प्रलय के समय वो ब्रह्मा जी की नासिका में रहा और प्रलय के बाद वो ही बालक ब्रह्मा पुत्र नारद हो गया, तथाकथित वर्ण सिर्फ कर्म बताती है उसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है और न ही भगवान् छुआछूत के पक्षधर है....
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