शादी के कुछ महीनो बाद ही मर जायेगा पति, ये जानते हुए भी सावित्री ने किया था सत्यवान से विवाह

"सती सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण छीन के लिए थे वापस ये तो सब जानते है लेकिन असली कहानी लगभग सभी को नहीं पता है, जाने सावित्री सत्यवान की असली कथा....."

image sources: punjabkesari

जो भी औरत अपने पति की थोड़ी से भी केयर करती है उसे आज कल लोग मजाक में या ताना मरते हुए "बड़ी आई सती सावित्री" कहते है! लेकिन सती सावित्री असल में कौन थी आखिर कैसे उसने अपने पति को जिन्दा करने की शक्ति प्राप्त की ये पूरी मर्म की कहानी कोई नहीं जानता है (कम ही जानते है)!

मद्र राज्य के राजा अश्वपति जिनकी पत्नी का नाम मालवी था बड़े ही प्रतापी राजा थे बस एक ही कमी थी की उन्हें कोई संतान नहीं थी. राजा ब्रह्मा जी की पत्नी देवी सावित्री के भक्त थे और अपनी निसंतानता दूर करने के लिए उन्होंने उन्ही की उपासना की, तब उन्होंने प्रकट होकर खुद ही उनकी पुत्री रूप में आने का वरदान दिया था.

नियत समय पर सावित्री उनकी पुत्री के रूप में जन्मी जिसका नाम भी सावित्री रख दिया गया, बेटी सर्वगुण संपन्न थी! धीरे धीरे वो विवाह योग्य हुई तो राजा को चिंता होने लगे उसके विवाह की क्योंकि उसके योग्य वर मिल नहीं रहा था राजा को और कम योग्य को बेटी देना भी एक अपराध है.

तब राजा ने बेटी से कहा की बेटी मुझे तुम्हारे योग्य वर नहीं मिल रहा है, तुम ही अपने लिए योग्य वर ढूंढ लो...


image sources: wikipedia

बेटी ने पिता की बात स्वीकारी और तीर्थ पर चली गई साथ ही अपने लिए योग्य वर भी ढूंढने लग गई, इसी दौरान उसकी मुलाकात सलवा देश के राजा द्युमत्सेन से हुई. राजा ने युद्ध में सब कुछ खो दिया था उन्हें वनवास में रहना पड़ रहा था उनकी ऑंखें भी चली गई थी लेकिन पत्नी और पुत्र ने साथ नहीं छोड़ा.

एक राजकुमार होते हुए भी पुत्र माता पिता की बेहतर सेवा कर रहा था, इसे देख सावित्री ने उसे ही अपना पति मान लिया. वापस आकर उन्होंने पिता को अपनी पसंद बता दी और पिता भी शादी के लिए तैयार हो गए थे, लेकिन तब नारद जी ने आकर डाल दिया इस निर्णय में व्यवधान.


image sources: webdunia

नारद जी ने सावित्री और उनके पिता को आकर कहा की सावित्री की पसंद सही नहीं है जिसे उसने चुना है वो सत्यवान अल्पायु है. लेकिन सावित्री ने कहा की वो सत्यवान को पति रूप में पाने का संकल्प ले चुकी है अब जो हो जैसा हो में तो उसी से विवाह करुँगी पीछे नहीं हटूंगी.

पिता ने भी बेटी का साथ दिया, दोनों का विवाह हुआ सावित्री और सत्यवान तब दोनों मिलकर माता पिता की सेवा करने लगे. जब सत्यवान की मृत्यु का समय आने लगा तो सावित्री ने वट सावित्री व्रत का अनुष्ठान किया जो की तीन दिन तक चलता है, उसी व्रत के फल से उसमे दैवीय शक्तिया आ गई थी.

नियत समय पर यमराज जब सत्यवान के प्राण ले चले तो वो भी उनके पीछे हो गई और एक एक करके मृत्युलोक से यमलोक जाने के हर मार्ग को पार करती गई. उसके इन मार्गो को पार करने के चलते ही यमराज ने उन्हें वरदान लेकर लौट जाने को कहा जिसके दौरान चतुराई से सावित्री ने सत्यवान को ही मांग लिया और इतिहास में अमर हो गई.

Share This Article:

facebook twitter google