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शिव पार्वती के दत्तक (गोद लिए) पुत्र है शुक्राचार्य, भोलेनाथ के गर्भ में रहे थे 3000 साल....

"दैत्य गुरु शुक्राचार्य का असली नाम उशना ऋषि है जो की ऋषि भृगु के पुत्र है, उन्हें ये नया नाम भगवान् शिव ने दिया था जिनकी पत्नी पार्वती ने उन्हें गोद ले लिया था."
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image sources:webdunia

अगर आप ये सोचते है की दैत्य गुरु शुक्राचार्य भी एक राक्षस ही है तो आप बेहद गलत हो क्योंकि आचार्य होने से जाती का कोई सम्बन्ध नहीं है. शुक्राचार्य असल में ब्राह्मण श्रेष्ठ भृगु ऋषि के पुत्र है जिनका असली नाम उशना है, वो दैत्यगुरु क्यों बने इसके विषय में आपने पहले भी हमारे ब्लॉग पढ़ लिए होंगे.

देवताओ के गुरु बृहस्पति से प्रतिस्पर्धा के चलते उन्होंने दैत्य गुरु का पद स्वीकार किया था हालाँकि उनके साथ भी अन्याय हुआ लेकिन वो भी अच्छे चेले नहीं बने थे. शुक्राचार्य के चलते ही दैत्यों ने कई बार त्रिलोकी पर राज किया और इस वसुंधरा को भोगा था लेकिन फिर देवताओ ने इसे जित लिया.

शुक्राचार्य अमर है और उन्होंने अपनी संजीवनी विद्या से मरे हुए दैत्यों को जिन्दा कर के फिर खड़ा कर दिया था जिसके चलते वो हर बार उठ खड़े होते है. लेकिन बहुत कम ही लोग जानते है की शुक्राचार्य भगवान् शंकर के दत्तक पुत्र है जिन्हे पारवती जी ने अपना पुत्र माना.

लेकिन आखिर क्या है इसके पीछे की कहानी, क्यों शुक्र नाम पड़ा उनका?


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असल में देवासुर संग्राम में शुक्राचार्य ने अंधक (शिव से ही उत्पन्न उनका ही पुत्र रूप था) को उकसाया और अधर्म मार्ग पे ले गए जिसके चलते उसने अपनी माँ यानि की पारवती से ही विवाह करना चाहा. तब शिव ने उसे अपने त्रिशूल में पिरो दिया था और शुक्राचार्य को निगल गए थे.

3000 साल तक शिव के पेट में ही रहे तब शुक्राचार्य लेकिन जीवित थे, पेट से ही कवि श्रेष्ठ शुक्राचार्य ने पेट से ही महादेव की उपासना की तब शिव ने प्रसन्न हो उसे अपने शुक्र रूप में बाहर निकाला और इस तरफ वो शुक्र कहलाये. तब पारवती ने उन्हें अपना पुत्र माना था और बहुत से वरदान भी दिए.

अमरता का वरदान शिव ने ही शुक्राचार्य को दिया है, तो ऐसे उशना शुक्राचार्य कहलाने लगे...
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