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हिन्दुओ का कब्रिस्तान : इस्लाम और ईसायत के जैसे इस स्थान पर दफनाए जाते है हिन्दू, लेकिन क्यों?

"कानपुर में हिन्दुओं का प्रथम कब्रिस्तान 1930 में बना, इसकी शुरुआत अंग्रेजों ने की थी वर्तमान में यह कब्रिस्तान कानपुर के कोकाकोला चौराहा रेलवे क्रॉसिंग के बगल "
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image sources: ajabgjab

ऊपर तस्वीर देकर आप चौंक गए होंगे की कब्र पर राम राम और हिन्दू औरत का नाम कैसे लिखा है जबकि हिन्दुओ को तो मौत के बाद जलाया जाता है. सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन उत्तरप्रदेश में अब तक 7 हिन्दू कब्रिस्तान बन चुके है जिसकी शुरुवात 86 सालो पहले हुई थी.

ये हिन्दू कब्रिस्तान कानपुर शहर में स्तिथ है जिनकी शुरुवात 1930 में अंग्रेजो के राज में ही हो गई थी, जो पहला कब्रिस्तान है वो एक धर्म गुरु के नाम से जाना जाता है. क्या आप कल्पना कर सकते है की धर्म के विरूद्ध ये काम एक धार्मिक गुरु ने ही क्यों करवाया शुरू?

दरअसल ये मामला लालच से शुरू हुआ, एक बच्चे की मौत हुई तब पंडितो ने क्रियाक्रम के लिए अंतिम संस्कार से पहले ही मोलभाव किया था. उन्होंने उचित दाम न मिलने पर अंतिम संस्कार कराने से मना कर दिया था, ऐसे में उन स्वामी जी ने उस बच्चे की लाश नदी में फिंकवा दी थी.

लेकिन उसके बाद शुरू हो गया समाज में एक परिवर्तन....


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असल में वो बच्चा दलित था लेकिन दलित होने से उन्हें कोई ऐतराज नहीं था, लेकिन उन्हें पैसे ज्यादा चाहिए थे जैसे की डॉक्टर्स और वकील लेते है. जबकि हिन्दू धर्म के अनुसार दलित से कुछ भी नहीं लिया जा सकता है केवल गाय के घी के सिवा लेकिन पाखंडियो ने अंतिम संस्कार नहीं करवाया.

तब स्वामी अच्युतानंद ने उस स्थान पर हिन्दुओ के लिए कबिर्स्तान बनवाया, अंग्रेजो से उन्होंने बात की और इस बाबत जमीन लेली. दुसरो के सामने उदाहरण पेश करने के लिए उन्होंने अपना शव भी वंही दफनाने की अपने चलो को शिक्षा दी, जिसके बाद ये प्रथा लोकप्रिय हो गई और अब वंहा 7 हिन्दू कब्रिस्तान हो गए है.

हैरानी आपको तब होगी जब आप जानेंगे की इस कब्रिस्तान की देखरेख एक मुस्लिम परिवार कर रहा है, यंहा सभी अंतिमसंस्कार मुस्लिम करते है. डेथ सर्टिफिकेट के लिए रसीद भी जारी होती है और दफनाने का खर्चा सिर्फ 500 रूपये होता है, है न अजीब... 

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