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अब फिल्मो में भी बलात्कार पीड़ित महिलाये नहीं करती है आत्महत्या....

"कभी वक्त था जब हिंदी फिल्मो में बलात्कार दिखाए जाते थे और बलात्कार के बाद पीड़ित आत्महत्या कर लेती थी, लेकिन अब वक्त बदल रहा है फिल्मो में भी एक्ट्रेस नहीं करती"
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image sources: indiatv

हालही में महिला दिवस गया तो महिला सशक्तिकरण के लिए सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा बॉलीवुड ने ही आवाज बुलंद की या उनके ही कमेंट को मीडिया ने हाई लाइट किया. अब भारत में ये कोशिश हो रही है की पुरुषवादी सोच को छोड़ समानता के अधिकारों की बात हो.

हालाँकि बॉलीवुड ही वो माध्यम है जिसने सबसे ज्यादा पुरुषवादी सोच का प्रचार किया था, पुरुषवादी सोच ये है की सिर्फ मर्द की ही इज्जत है महिला की नहीं उसे तो सिर्फ मर्द की इज्जत बचाने का काम ही सौंपा गया है. आप अगर गौर करे तो पाएंगे की फिल्मो में जब किसी एक्ट्रेस का बलात्कार होता था वो अपने परिवार को बदनामी से बचाने के लिए आत्महत्या कर लेती थी.

जब समाज महिला की इज्जत को बचा नहीं सकता तो महिला क्यों समाज के लिए अपनी जान दे? लेकिन फिर भी आज महिला सशक्तिकरण का ठेकेदार बना बॉलीवुड इस पुरुषवादी सोच का प्रचार करता रहा, हालाँकि सोच बदली है और अब फिल्मो में भी बलात्कार पीड़ित आत्महत्या नहीं करती है और जिन्दा रह कर इन्साफ के लिए लड़ती है.

लेकिन इसके लिए भी बॉलीवुड ही जिम्मेदार है, हालाँकि उनकी सोच देरी से बदली...1978 में आई फिल्म घर से हुई शुरुवात


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अस्सी नब्बे के दशक से पहले और यु कहे की इस दौरान भी बॉलीवुड परदे पर जिस किसी भी औरत के साथ रेप या सामूहिक बलात्कार होता था वो आत्महत्या ही करती थी जो की अब नहीं होता. 1978 में आई फिल्म घर में विनोद मेहरा की पत्नी रेखा के साथ भी गैंग रेप होता है, हालाँकि वो इस हादसे से टूट जाती है लेकिन आत्महत्या नहीं करती है.

जबकि 1986 में आई फिल्म "आखिरी रास्ता" (अमिताभ जया प्रदा) में बच्चे को बचाने के लिए बलात्कार पीड़ित बनने के बाद जया प्रदा फांसी लगा लेती है. मिथुन की फिल्म फूल और अंगार में उनकी बहन तो फारुख शेख की फिल्म अब इन्साफ होगा में वो खुद आत्महत्या कर लेते है.


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अब ये सोच बदली है और रेप के बाद आत्महत्या नहीं बल्कि बदले और इन्साफ की कोशिश होती है बॉलीवुड फिल्मो में और ये ही सोच में बदलाव है. रेप पीड़ित का अगर धार्मिक पहलु देखे तो शाश्त्र कहता है की औरत की रक्षा सिर्फ भगवान् ही कर सकता है और कोई नहीं.

खुद गौतम ऋषि ने भी अहिल्या को अपना लिया था, बृहस्पति ने भी ऐसा ही किया था और तो और सुग्रीव ने भी अपनी पत्नी रुमा को बाली से फिर हासिल कर पूरा सम्मान दिया था. भयंकर उत्पीड़न के बाद भी द्रौपदी ने आत्महत्या नहीं की बल्कि पतियों को बदले के लिए ही उकसाया था तो आज की महिला फिर आत्महत्या क्यों न करे.

हालाँकि आत्मसम्मान (स्वाभिमान) का भाव तो महिलाओ में होना ही चाहिए, विदेशो में महिलाये कुछ देर के बाद रेप का विरोध नहीं करती है और लगभग तीन चौथाई मामलो में रेप का केस भी नहीं करती है (न्याय के लिए) ऐसा भी न हो ये भी देखना है समाज को.

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