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फिल्मफेर रिजेक्ट करने वाली पहली अभिनेत्री जिसके चलते साढे चार महीनो तक होटल में रही थी राजकपूर की पत्नी

"बिस साल तक हिंदी फिल्मो में राज करने वाली ये अभिनेत्री साउथ सिनेमा से हिंदी फिल्मो में सबसे पहले झंडे गाड़ने वाली पहली अभिनेत्री थी. फिल्मफेर अवार्ड मिला लेकिन इन्होने लेने से इंकार कर दिया था..."
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1955 में दिलीप कुमार देवदास बने थे जिसमे कोठेवाली चंद्रमुखी का किरदार वैजयंतीमाला ने निभाया था जिसके लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के लिए फिल्मफेर अवार्ड मिला था. लेकिन उन्होंने इस अवार्ड को ये कह कर लेने से इंकार कर दिया था की वो सपोर्टिंग नहीं लीड एक्ट्रेस हूँ.

बॉलीवुड फिल्मो के इतिहास में वो पहली ऐसी एक्ट्रेस है जिन्होंने फिल्मफेर अवार्ड को रिजेक्ट किया, साथ ही वो साउथ इंडियन फिल्मो से बॉलीवुड में आने वाली पहली अभिनेत्री है और उनकी सफलता का बॉलीवुड में आज तक कोई सानी नहीं रहा है. लगातार 20 सालो तक उन्होंने एक से बढ़कर एक हिट फिल्मे दी थी.


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1951 में बहार फिल्म से बॉलीवुड में एंट्री की और 1968 में अपनी शादी के बाद उन्होंने फिल्मो को अलविदा कह दिया था हालाँकि जो फिल्मे उन्होंने साइन की थी उन्हें जरूर पूरा किया (शादी के बाद तक). लेकिन शादी के बाद भी उन्हें लीड एक्टर्स के साथ काफी बड़ी फिल्मे ऑफर होती रही लेकिन उन्होंने सबको ना कह दिया.

1968 में शादी के ही साल उन्होंने "सपनो का सौदागर" फिल्म जो की राजकपूर के साथ थी को ना कहा जिसके बाद हेमा मालिनी को ये रोल मिला और बॉलीवुड में छा गई. इंदिरा की बयोपिक है करके बेन हुई फिल्म "आंधी" में भी लीड रोल उन्हें मिल रहा था लेकिन उन्होंने नहीं लिया.

त्रिशूल फिल्म में अमिताभ शशि की माँ का रोल भी उन्हें ऑफर हुआ लेकिन उन्होंने नहीं किया जो की बाद में निरुपमा को मिला और वो यादगार बन गई.


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उनके एक्टिंग करियर के दौरान कई विवाद भी उठे जिनसे कुछ क्रमश है, ज्यादातर फिल्मे दिलीप कुमार के साथ की इसके लिए दोनों की केमिस्ट्री को देखते हुए दोनों के बिच चक्कर चलने की अफवाह मीडिया में खूब उडी थी. उन्हें दिलीप कुमार का तीसरा प्यार कहा गया था.

उस समय मीडिया में ये सुर्खिया थी की जिस साडी का पल्ला दिलीप पहन ले वो ही साडी वैजयंती हर फिल्म के दृश्य में पहनती थी. ऐसी ही कुछ बातें राजकपूर और उनके बारे में भी सामने आई थी ऐसा कहा जाता है की वो तो नहीं लेकिन राजकपूर उनमे काफी इंटरेस्टेड थे हालाँकि वो शादी शुदा थे तब भी.


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ऐसा भी कहा गया की काफी आरसे बाद भी जब राजकपूर अपने इरादों से पीछे नहीं हटे तो उनकी पत्नी घर छोड़ के चली गई थी और साढ़े चार महीने तक वो होटल में रही थी. हालाँकि बाद में अपने करियर के ख़त्म होने के उपरांत दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा की ये सब पब्लिसिटी स्टंट थे (मीडिया के) इनमे कोई सच्चाई नहीं थी.

चम्पाबाई, संगम, गंगा जमुना और संघर्ष फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेर अवार्ड मिला था जो की उनकी काबिलियत का सबूत था और तब अवार्ड बेचे जाने की अफवाहे भी नहीं उठती थी. प्रिंस उनकी अंतिम फिल्म थी और उसके बाद उन्होंने राजनीती में अपनी पहचान बनाई. 

वो तमिलनाडु से कांग्रेस की तरफ से लोकसभा चुनाव लड़ी और जनता पार्टी के प्रतियोगी को हराया और लगातार दो बार जीती थी वो. 1993 में उन्हें कांग्रेस ने राज्यसभा में भेज दिया और 1999 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया था, उन्होंने सोनिआ को पत्र लिख नेतृत्व पर सवाल उठाये थे.

अब वो शांति से जीवन जी रही है लेकिन उनके अभिनय को बॉलीवुड भूल नहीं पायेगा... 

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