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अर्द्धनारीश्वर रूप के पीछे छुपे इस सत्य को जान आपकी रूह कांप उठेगी!

"भगवान की महिमा अपने भक्तो से ही है, भगवान अपने से ज्यादा अपने भक्तो का गुणगान करने से अत्यधिक प्रसन्न होते है. ऐसे ही एक परम भक्त जिनकी महिमा हालाँकि उतनी नही "
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भगवान की महिमा अपने भक्तो से ही है, भगवान अपने से ज्यादा अपने भक्तो का गुणगान करने से अत्यधिक प्रसन्न होते है. ऐसे ही एक परम भक्त जिनकी महिमा हालाँकि उतनी नही फैली जितनी की होनी चाहिए क्योंकि उनकी भक्ति में थोड़ी सी कमी रह गई थी जिसकी बाद में उन्होंने भरपाई की.

"शीश गैंग अर्धांग पार्वती..... नंदी भृंगी नृत्य करात है" शिव स्तुति में भृंगी नाम आपने सुना होगा, ये एक पौराणिक कालीन ऋषि थे जो की शिव के परम भक्त थे. लेकिन भक्त कुछ ज्यादा ही कट्टर थे, इतने की शिव की तो आराधना करते लेकिन बाकि भक्तो की भांति पार्वती को नहीं भजते थे.

उनकी भक्ति अदम्य थी लेकिन वो पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या यु कहे उनके कुछ नही समझते थे, ये उनका घमंड नही बल्कि शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिव के आलावा कुछ और दीखता ही नही था. एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे.

image sources: yogoesoteric.com

इस पार्वती ने ऐतराज जताया और कहा की हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नही कर सकते पर कट्टरता देखिये भृंगी ने पार्वती को अनसुना किया और शिव की परिक्रमा लगाने बढे. लेकिन तब पार्वती शिव से सट के बैठ गई, मामले में और नया मोड़ आया भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही.

तब शिव ने पार्वती का साथ दिया और संसार में अर्धनारीश्वर रूप धरा, तब भृंगी क्या करते पर गुस्से में आके उन्होंने चूहे का रूप धरा और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे. पर तब शक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी को श्राप दिया की जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तुरंत तुम्हारी देह छोड़ देगा.

image sources: blogspot.com

तंत्र साधना के हिसाब से मनुष्य को अपनी देह में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की दें होती है जबकि खून और मांस माता की, श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया. भृंगी निढाल हो जमीं पे गिर पड़े और हालत ये थे की वो खड़े भी होने की स्थिति में नही थे, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल की क्षमा मांगी.

हालाँकि तब पार्वती ने अपना श्राप वापस लेना चाहा पर अपराध बोध से भृंगी ने मना कर दिया, पर उन्हें खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके. तो भक्त भृंगी के कारण हुआ था अर्धनारीश्वर रूप का उदय. 
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