कर्ण ने पीछे से वार करके धोखे से काट दिए थे अभिमन्यु के अश्त्र, अन्यथा उसी दिन समाप्त हो जाता युद्ध

"कर्ण को पितामह भीष्म और द्रौणाचार्य ने अर्धरथी कह कर उसका खूब मजाक उदय इसलिए 10 दिन तक वो युद्ध नहीं लड़ा, इससे पहले 4 बार छोड़ चूका था मैदान फिर काहे का सुरवीर.."
100 बार अगर झूठ को पुरे आत्मविश्वास से कहा जाये तो वो लोगो को सच लगने लगता है हालाँकि वो सत्य नहीं होता है! महाभारत का असली नाम "भरत संहिता" है, भयंकर युद्ध के कारण ये ग्रन्थ अब महाभारत कहलाता है जो की भारत का इतिहास है को मिथ नहीं.

मारे गए योद्धाओ में सबसे कम उम्र के प्रतिभावान योद्धा की अगर बात हो तो अर्जुन पुत्र अभ्मन्यु का ही नाम सबकी जुबान पर आएगा, जिसने अकेले ही कौरवो के छक्के छुड़ा दिए. यदि उसके साथ धोखा न हुआ होता तो उसी दिन वो युद्ध समाप्त कर देता क्योंकि वो अर्जुन से किसी भी मामले में कम नहीं था.

एक भ्रान्ति और दूर करले की अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसने के आलावा बाहर निकलने की भी युक्ति पता थी लेकिन क्षत्रिय युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाते इसलिए उसने युद्ध से निवृत होना उचित नहीं समझा था. अभिमन्यु की प्रसंसा जब द्रौणाचार्य के मुख से निकल कर दुर्योधन के हृदय को विदीर्ण करने लगी तो वो क्रोध से तलमला उठा था.

सभी कुरान मिल के भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते यदि कारण ने न की होती कायरता...


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विराट पर्व के अंत में अज्ञातवास समाप्त होते ही अकेले अर्जुन ने सभी कौरवो के दांत खट्टे कर दिए थे, भीष्म और द्रौणाचार्य मूर्छित हो गए थे और कर्ण भी मैदान छोड़ के भाग गया था. उस अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु को भी उसी के मुकाबले का योद्धा कहा गया है क्योंकि उसे स्वयं अर्जुन ने शिक्षा दी थी जो उस समय के धनुर्धारियों में श्रेष्ठ था.

अर्जुन को योजना के तहत युद्ध भूमि से दूर कर द्रौणाचार्य युधिस्ठर को कैद कर युद्ध को जितना चाहते थे लेकिन अभिमन्यु के रहते ये संभव नहीं हो पाया. अकेला अभिमन्यु घुस गया चक्रव्यूह में और एक एक करके सभी योद्धाओ के छक्के छुड़ा दिए, लेकिन द्रौणाचार्य के मुंह से अभिमन्यु कीप्रसंसा सुन दुर्योधन ने युद्ध के नियम तोड़ने के आदेश दिए.

ऐसे में जनाः एक योद्धा से एक ही की युद्ध का नियम था, सभी कौरव टूट पड़े अभिमन्यु पर लेकिन तब पर अभिमन्यु ने दिखाए ऐसे हाथ की उसको हरा पाना असंभव हो गया. इस्पे अगर 4 पांडव और साथ होते तो कौरव उसी दिन समाप्त हो गए होते, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था.


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ऐसे में दुर्योधन ने जब उसकी मृत्यु का द्रौणाचार्य से उपाय पूछा तो उन्होंने कहा की नियमो से उसको रोकना असंभव है, हां यदि कोई पीछे से उसके हथियार काट दे तो वो बीएस में आ सकता है. तब गुस्साए कर्ण ने वैसा ही किया अभिमन्यु के पीछे से उसके सभी हथियार काट डाले और उसे बानो से बेध दिया.

इसके बाद जो हुआ वो आप सबको विदित है, लेकिन अगर कौरव नियम नहीं तोड़ते तो वो भी नहीं मारे जाते और युद्ध और लम्बा खींचता. ऐसे में कर्ण को शूरवीर कहने वालो को सोचना चाहिए की अधर्मी के पक्ष से युद्ध करने वाले कायर को क्या उपमा दे...

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