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भरत चाहते तो रामजी लौट आते चित्रकूट से ही वापस अयोध्या, जाने आखिर क्या हुआ ऐसा के...

"अगर भरत चाहते तो अयोध्या का राज स्वीकार कर सकते थे लेकिन वो सारे समाज को साथ ले चल दिए थे चित्रकूट रामजी को वापस लिवाने, लेकिन अगर वो चाहते तो ले भी आते तो क्यो"
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महाभारत, गीता जी और रामायण हो या कोई भी धार्मिक ग्रन्थ (पुस्तक), उन्हें जितनी बार पढ़ेंगे जितना के मुंह से सुनेंगे तो आपको अलग अलग भावार्थ समझ में आएंगे आपके मन में अलग अलग विचार उठेंगे! हो सकता है आपने रामायण पूरी पढ़ी हो लेकिन ये भाव अब भी आप जान नहीं पाए होंगे...

जी हाँ भरत जी अगर चाहते तो राम जी को चित्रकूट से ही लौटा लाते लेकिन ऐसा क्या कारण था की जिन राम जी को वो लेने गए थे उन्हें ही वो लिए बिना लौट आगये, जबकि वो चाहते तो राम जी को वापस ले जा सकते थे उनके ही पाले में थी सारे रघुवासंश की मर्यादा....


image sources: pinterest

जी हाँ, जब अयोध्या से भरत जी चले थे तो उनके साथ राम जी के अभिषेक की (वन में ही अभिषेक करना चाहते थे!) पूरी तयारी थी लेकिन वंहा पहुंचने पर राम जी ने इसके लिए मनाही कर दी. तब भरत ब्राह्मणो की भांति धरने पर बैठ गए, ब्राह्मणो के जैसे से अर्थ है जब कभी किसी दलित या वैश्य पर राजा या को और अत्याचार करता था तो वो ब्राह्मण के पास मदद को जाते थे!

तब ब्राह्मण अनाचारी के घर के सामने ही अनशन पर लेट जाता था, ब्राह्मण हत्या के पाप से बचने के लिए अनाचारी दलित या वैश्य के साथ पुनः न्याय करता था. तब राम जी ने भरत जी से कहा की भाई मेने तुम्हारा क्या बुरा किया है जो तुम मेरे धर्म के बिच में आ रहे हो.


image sources: blogspot

तब भरत ने धरना तो छोड़ दिया लेकिन वो अपनी जिद पर अड्डे रहे, तब राम जी ने थक हार कर कहा की अब मेरा धर्म भरत के हाथ में है वो जैसा कहेगा मैं वैसा ही करूँगा. तब सब भरत की और देखने लगे, ऐसे में भरत उठ कर रोने लगे और बोले की असल में रामजी जो कर रहे है वो ही धर्म है...

मैं तो अपने स्वार्थ के चलते और उनके दर्शन की लालसा के चलते वन में सबको ले आया हूँ, सब मुझे ही वनवास का दोषी समझ रहे है इसलिए मेने ये सब कर दिया है! लेकिन में सच कहता हु की मुझे न राज्य चाहिए न ही कुछ और में अयोध्या की गद्दी पर नहीं बैठूंगा क्योंकि इस्पे रामजी का ही अधिकार है.

तब सब अयोध्या लौट गए और भरत जी सरयू के किनारे एक पर्ण कुटी में रहने लगे वो सिर्फ गौ मूत्र में निर्मित जौ का दलिया ही खाते थे और राम जी की पादुका ही अयोध्या पर राज करती रही थी.

story sources: valmiki & tulsikrit ramayan
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