जल्द चाहिए धन या व्यवसाय में लाभ, तो करे ये छोटे से उपाय...

"आज कल सब पैसे के पीछे भाग रहे है लेकिन पैसा है की किस्मत को सलाम ठोकता है, बिना भाग्य के कुछ भी नहीं मिलेगा जब तक देव सहाई न हो! देवो की कृपा प्राप्ति के आसान.."
"आदमी कहता है की पैसा आये तो मैं कुछ करू, और पैसा कहता है की आदमी कुछ करे तो मैं आंवु!" ऐसे स्लोगन आपने सोशल मीडिया में बहुत पढ़े होंगे! है भी ऐसा ही, बिना प्रयास के यंहा कुछ भी हासिल नहीं होता है व्यक्ति को पुरुषार्थ करते ही रहना चाहिए लेकिन...

ये बात भी पूर्ण सत्य है की आपके हाथ वही आएगा जो आपके पूर्व कर्मो से आपकी किस्त्मत में कम से कम इस जन्म के लिए लिखा जा चूका है! लेकिन ऐसा भी नहीं है की आप अपने भाग्य को पलट नहीं सकते है, 12 वर्ष की आयु वाले मार्कण्डेय ने अमरत्व प्राप्त किया था वंही ब्राह्मण होके भी कुबेर आज धन के अधिपति है.....परन्तु 



मार्कण्डेय और कुबेर ने भी ये पुरुषार्थ भगवान् को प्रसन्न करके ही पाए था अपने से नहीं, मतलब व्यक्ति पुरुषार्थ (किस्मत को बदलना) तभी कर सकता है जब भगवान् सहायक हो! ऐसे ही अगर आपको इस जन्म भर के लिए थोड़े से परिश्रम से अधिक धन लाभ चाहिए तो आपको पितरो को प्रसन्न करना होगा!

पितृ आपके ही पूर्वज है और साथ में देवताओ के भी इष्ट होते है, वो प्रसन्न मतलब देव प्रसन्न उनको प्रसन्न करने के लिए आपको ज्यादा विशेष कुछ नहीं करना है! हर अमावश्या और पूर्णिमा को गाय के दूध से बनी खीर और बिना नमक की पूड़ी शत्रु के जानकर ब्राह्मण को या स्वाभाव से ब्राह्मण को घर पे बुला के खिलाना है!

अगर योग्य ब्राह्मण न मिले तो गाय या सांड (बैल) को ही आदर पूर्वक वो श्रद्धांन खिला दीजिये देव प्रसन्न होंगे, इसके आलावा भी और सिद्ध उपाय है वो भी जाने....



हर कृष्ण पक्ष की अष्ठमी के दिन भी आप ये कार्य कर सकते है, इसके आलावा आपको अगर धन की आशा है तो हमेशा पश्चिम की तरफ मुंह करके ही खाना खाये. एक सबसे सफल और अकाट्य उपाय और जाने श्राद्ध पक्ष में त्रयोदशी के दिन गाय के दूध से निर्मित गाय का घी मिश्रित खीर पितरो के निमित दान करे सारे धन संकट दूर हो होंगे!

इसमें भी अगर मघा नक्षत्र मिल जाए तो कहना ही क्या आपने अपना अपने पूर्वजो का जीवन सफल कर दिया ये समझ लीजिये, ये सभी बातें पितामह भीष्म (देवव्रत) ने युधिस्ठर को अपने मरने से पहले बताई है! इसपे विशवास करके पूर्ण श्रद्धा से करे ये काम जल्द होगा धन लाभ.

story sources: mahabharat (geetapress)

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